श्री शान्तिसूरीश्वरजी
का जीवन चरित्र
गुरुदेव श्री शान्तिसूरीश्वरजी का जन्म संवत् 1946 की माह सुदी पंचमी, दि. 25-01-1890 वसंत पंचमी के दिन राजस्थान के सिरोही जिले के मणादर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री भीमतोलाजी एवं माता का नाम वसुदेवी था। उनका सांसारिक नाम सगतोजी रखा गया।
1946
1946
आहिर कुल में जन्म लेने के कारण बचपन से ही वे जंगलो में गायों और पशुओं को चराने ले जाया करते थे। आठ वरसनी वय थई, अजब बन्धु कहवाय। जंगल ढोर चरावता, भावि लेख घड़ाय।।
जंगल में पशुओं को चराते चराते अक्सर प्रभु ध्यान और भक्ति मग्न रहने लगे। अपने पूर्व जन्म के कर्मो की वजह से काफी कुशाग्र बुद्धि के थे। आठ वर्ष की उम्र तक ही उनको इस सांसारिक राग द्वेष का ज्ञान हो गया था।
आठ वर्ष की उम्र में वे अपने सांसारिक काका श्री तीर्थविजयजी के संपर्क में आए और उनके साथ ही विचरण करने लगे।
आठ वर्ष की उम्र में वे अपने सांसारिक काका श्री तीर्थविजयजी के संपर्क में आए और उनके साथ ही विचरण करने लगे।
ओगणीसे एकसठ अने, गाम रामसीण मांय।
वसंत पांचम शुभ दिने, दीक्षा ले गुरु त्यांय।।
आठ वर्ष से लेकर सोलह वर्ष की उम्र के बीच श्री तीर्थ विजयजी की सेवा में रहे। उन्हीं के साथ विचरण करते और साधुओं के आचार विचार का अनुभव प्राप्त किया।
यह वह समय था जब उन्होंने जैन साधु की क्रियाओं को नजदीक से देखा, पालन किया और अपने पूर्व जन्म के तपोबल से सोलह वर्ष की उम्र में सांसारिक जीवन को त्याग कर साधु जीवन में प्रवेश किया।
संवत् 1961 की बसन्त पंचमी को उन्होने सोलह वर्ष की उम्र में जालोर जिले के रामसीण गाँव में अपने सांसारिक काका श्री तीर्थविजयजी के हाथों दीक्षा ग्रहण की।
आपका नाम
शान्तिविजयजी रखा गया।
1946
1961
दीक्षा के बाद, पंच महाव्रतों को अंगीकार कर
शान्तिविजयजी माण्डोली पधारे जहाँ कि आपके दादा
गुरुदेव श्री धर्मिविजयजी का अग्निसंस्कार किया गया था।
उस पुण्य स्थान का दर्शन कर आप वापिस रामसीण आए।
कुछ समय आपने रामसीण-मुड़तरा में ही व्यतीत किया।
अपना तृतीय चतुर्मांस मुडतरा में कर अपने गुरु श्री
तीर्थंविजयजी से आज्ञा ले कर आपने आबू पर्वत की ओर
विहार किया।
रामसीण थी विचर्या, माण्डोली नी माय।।
महाव्रत पाय।
रामसीण थी विचर्या,
माण्डोली नी माय।।
जन्मभूमि कहेवाय।
ट्रंक समय अिहयां रही,
रामसीण मां जाय।।
जन्मभूमि कहेवाय।
टूंक समय अिहयां रही,
रामसीण मां जाय।।
शान्तिविजयजी माण्डोली पधारे जहाँ कि आपके
दादा गुरुदेव श्री धर्मिविजयजी का अग्निसंस्कार
किया गया था। उस पुण्य स्थान का दर्शन कर आप
वापिस रामसीण आए।
किया। अपना तृतीय चतुर्मांस मुडतरा में कर अपने
गुरु श्री तीर्थंविजयजी से आज्ञा ले कर आपने आबू
पर्वत की ओर विहार किया।
केरु धाम।
कुमार पाले बांध्यं, अमर गवायुं
नाम।।
सरस्वती नुं स्थान।
हेमाचार्य सूरीश्वरे, साध्यं आतम
ध्यान।।
गुरुराय।
मौन तपस्या आदरी, आतम
ध्यान सधाय।।
श्री गुरुदेव भगवान का विचरण अजारी नामक गाँव में हुआ जो कि सिरोही के बहुत ही नजदीक है। यहाँ का मार्केण्डश्वर आश्रम, जहाँ सरस्वती का बहुत ही प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है, यहाँ की गुफाओं में गुरुदेव ने ध्यान किया।
यह स्थल एक ऐतिहासिक स्थल है जहाँ समय-समय पर महान आत्माओं ने ध्यान कर इस स्थान की पवित्रता को बनाए रखा। इनमें मुख्य नाम हैं मार्कण्ड ऋषि, श्री सिद्धसेन दिवाकर, श्री अभयदेवसूरि, कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्राचार्यजी तथा पण्डित कालीदास।
जिस प्रकार जिनदत्तसूरीजी ने ‘ओमकार’ का ध्यान, श्री हेमचंद्राचार्यने ‘अहम पद’ का ध्यान तथा जिनकुशलसूरीजीने हींकार का ध्यान किया था उसी प्रकार गुरुदेव ने ॐ ह्रीं अर्हम् पद का ध्यान मुख्य रुप से किया। ऐसा कहा जाता है कि ध्यानस्थ दशा में आपको दादा गुरुदेव श्री धर्मविजयजी की अपूर्व कृपा सहज में ही प्राप्त हो गई थी।
संवत् 1968 के आसपास गुरुदेव ने गुजरात तथा मालवा की तरफ प्रयाण किया। पालीताणा में आपका योगनिष्ठ श्री कर्पूरविजयजी का समागम होने पर उन्होंने कहा 'शान्तिविजयजी ! आप तो शास्त्रों का मर्म मेरे से अधिक गहराई से जानते हो।
उसके पश्चात् आपने श्री गिरनार पहाड़ पर गुफाओं में ध्यान किया। संवत् 1968 का चतुर्मास आपने श्री गिरनार में ही किया। उस समय आपकी सेवा में निचला दातार के मुजावर रहे। जूनागढ से गोधरा ओर गोधरा से मालवा तरफ विहार करते धारा नगरी पधारे। वहाँ की राज व्यवस्था रानी साहिबा करती थीं।या।
उनकी अध्यक्षता में आर्य समाज के आचार्य के साथ शास्त्रार्थ में गुरुदेव ने क्षण मात्र में एसा तर्क उपस्थित किया कि वे दुविधा में पडकर चुप हो गए। अंत में रानी साहिबा को यह फैसला देना पडा कि 'शास्त्रार्थ में शान्तिविजयजी की जीत हुई है और आपका सिद्धांत सच्चा है।'
धार से आप ईडरगढ़ पहुँच, जहाँ 2300 वर्ष पुराने शांतिनाथ भगवान के देरासर के पीछे गुफा में आपने ध्यान किय।
हिंसक प्राणी रहे इंहा, मीत तणो नहीं पार।
त्यां साधी छे साधना, क्षमा शांति हथियार।।
इन्द्रिय बल ने जीतवां, भोजन शुष्क कहाय।
मीठा वगरना बाकला, आरोग्या गुरुराय।।
मालवा से गुरुदेव ने माण्डोली की तरफ विहार किया। बहुत लम्बे समय के पश्चात् अपने गुरु श्री तीर्थविजयजी से मुलाकात हुई। गुरु-शिष्य का यह मिलन एक लम्बे अंतराल के बाद हुआ था।
अपने गुरु के पास कुछ समय रहने के बाद उग्र साधना द्वारा पूर्णता प्राप्त करने हेतु आप आबू की तरफ पधारे। सतत मौन तथा ध्यान के साथ ऐसी उग्र तपस्या की जिसकी कल्पना भी करना मुश्किल है।
आबूरोड के पास ऋषिकेश नामक स्थान है जहाँ सर्पों का साम्राज्य है। वहाँ 6 महीनों तक सर्पों के बिलों पर ध्यान किया।
उन दिनों जहाँ श्री गुरुदेव ने साधना की, जंगली और हिंसक
प्राणी उनके आसपास ही विचरण करते थे।
उन दिनों आप आहार रूप में दिन में एक ही बार उड़द के
बाकुलों का सेवन करते थे और वह भी बिना नमक का।
उन दिनों गुरुदेव के पास खोड़ गाँव के ब्राह्मण भभूताजी रहते
थे। जब वे गुरुदेव को गोचरी बोहराने जाते थे तब गुरुदेव के
आसपास साँपों के विचरण से घबरा जाते थे और तुरंत ही
लौट कर आ जाते थे।
भभूताजी ने बताया था कि एकाक्षी नारियल सहज में प्राप्त
होने से गुरुदेव ने उसे सिद्ध किया और वह नारियल गुरुदेव
से बातें किया करता था। नारियल को सिद्ध करने के बाद
उसको कुएँ में डाल दिया गया।
निजानंद में झूलता, भजे सदा किरतार।।
संवत् 1973-74 का चातुर्मास आपने जोधपुर प्रदेश के जसवंतपुरा ग्राम
के सूंधा पहाड़ पर किया।
इसी पहाड़ पर चामुण्डा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।
इस मंदिर पर नवरात्रि में अनेकानेक पशुओं की बलि दी जाती थी।
अपने गुरुदेव तो जीव प्रति पालक थे। कई महीनों तक आपने मौन के
साथ तप एवं ध्यान किया।
आपके प्रबल तप की वजह से ही माताजी ने यहाँ के पुजारी को हिंसा
बंद करने का आदेश दिया और इस प्रकार आस-पास जो हिंसा होती
थी पूर्ण रूपेण बंद हो गई।
जोधपुर राज्य में कई जगहों पर हिंसा बन्द होने के समाचार तार, पत्रों
द्वारा प्राप्त हुए।
बामणवाडा तीर्थमां, ध्यान कर्यु गुरुराय। पटकाया पत्थर परे, मस्तक त्यां ढुंढाय।। धारारक्त तणी वही, कष्ट तणों नहीं पार। महा उपसर्ग सह्यो प्रभु, क्षा शांति गुणभार।।
काफी लम्बे अंतराल के बाद गुरुदेव श्री बामणवाड़जी पधारे।
बामणवाड़जी वह तीर्थ है जिसके आसपास भगवान महावीर ने भी विचरण किया था।
गुरुदेव एक बार ध्यानावस्था में अपने कमरे से लगभग पंद्रह फुट की ऊंचाई से गिरे और उनके मस्तक से खून की धारा बहने लगी।
आवाज सुनाई देने पर लोग दौड़ कर आए और देखा तो गुरुदेव ने बिल्कुल विचलित हुए बिना कहा-कुछ नहीं ॐ शांति।
उस समय धनारी वाले पूज्यजी महाराज ने पट्टी बांधकर उनका उपचार किया!
संवत् 1975 से 1979 तक का काल वह समय है जिसके बारे में शत प्रतिशत कुछ कह पाना मुश्किल है,
लेकिन अनुमानतः वे आबू के जंगलो और गुफाओं में ध्यानस्थ रहे।
इस काल में आप शिवगंज, नाणाबेडा, रोहिड़ा, भीमाणा, धनारी, किंवरली आदि स्थानों पर समय-समय पर विचरण किये।
काफी समय श्री गुरुदेव का मार्कण्ड ऋषि के आश्रम में, सरस्वती मंदिर की गुफा में एवं आसपास अघोर सरस्वती अरण्य में उग्र तपस्या में व्यतीत हुआ।
ध्यान के प्रभाव से गुरुदेव को आत्म ज्ञान का संचार हुआ। त्रिकाल ज्ञान एवं जनता के मनोगत भाव आप सहज में ही जान लेते थे। ध्यान के प्रभाव से आपको कई सिद्धियां प्राप्त होती गई।
उस समय आपकी सेवा में किंवरली गाँव के ब्राह्मण श्री लक्ष्मीनारायणजी रहते थे।
उनको भी गुरुदेव की सेवा में रहने से दैवी शक्ति से संस्कृत का ज्ञान संपादित हुआ और गीता, भागवत आदि शास्त्रों के हजारों श्लोक कंठस्थ हो गये।
1946
वे कहते हैं कि सरस्वती देवी धूपदानी में से प्रगट होकर गुरुदेव के साथ बातचीत करती
और कभी कभी मूर्ति के साथ भी आमने सामने बातचीत चलती हुई उन्होंने देखी है।
आप समय-समय पर कई गांवों और शहरों का विहार करते रहे।
आपका समाज में प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
संतों, पंडितों, धर्माचार्यों, राजा-महाराजाओं ने आपसे प्रेरणा ली।
गांवों में जब गुरुदेव पधारते थे, तो लोग एक झलक पाने के लिए दौड़ पड़ते थे।
आपके प्रवचनों में बड़ी सरलता और गहराई होती थी।
वाणी में करुणा थी और जीवन में संयम।
कई बार डाकू भी आपकी शरण में आकर शांत हो जाते थे।
आपका उद्देश्य हमेशा आत्म कल्याण की भावना से प्रेरित होता।
आपको लोग योगी, महात्मा, तपस्वी मानते थे लेकिन आप स्वयं को हमेशा एक साधु ही कहते।
गुरुदेव का तप देखकर बड़े-बड़े पंडित, आचार्य, तपस्वी, ब्राह्मण, राजा और कई वरिष्ठ संतों ने आपको 'युग पुरुष', 'तपोनिधि', 'योगीराज' आदि उपाधियों से नवाजा।
एक बार समाज के कई वरिष्ठ विद्वान और साधुजनों ने विचार किया कि इस महापुरुष को आचार्य पद दिया जाए,
लेकिन गुरुदेव ने विनम्रता से कहा – ‘मुझे किसी पद या सम्मान की इच्छा नहीं। मैं तो सिर्फ एक साधना करने वाला मुनि हूं।’
इसलिए उन्होंने जीवन भर किसी भी पद को स्वीकार नहीं किया और न कभी उपदेश या प्रवचन के लिए मंच पर चढ़े।
नवरात्रि जैसे पर्वों पर होने वाली पशुबलि के खिलाफ उन्होंने कभी भाषण नहीं दिए, बल्कि मौन तप और प्रार्थना से मंदिरों की देवियों को प्रभावित किया।
राजस्थान के एक प्रसिद्ध मंदिर में जब वे मौन साधना कर रहे थे,
तो वहाँ के पुजारी ने स्वप्न में देवी से आदेश पाकर बलि देना बंद कर दिया।
इस प्रकार कई स्थानों पर हिंसा रुक गई और लोगों का दृष्टिकोण बदल गया।
गुरुदेव जहाँ भी जाते, वहाँ का वातावरण बदल जाता।
गाँव स्वच्छ हो जाते, लोग झगड़े छोड़ देते, शराब का त्याग
कर देते।
आपके आने से गाँव में एक उत्सव जैसा माहौल बन जाता।
आपने कभी किसी को डांटा नहीं, लेकिन लोग अपने आप
सुधर जाते।
– सेवा, त्याग और करुणा का।
गुरुदेव पूर्णतः मौन में चले
गए।
वे आबू के पास अजारी की
गुफाओं में रहते थे।
आंतरिक साधना में लीन रहते थे।
ऐसा लगता था कि वे शरीर में रहते हुए भी शरीर
से परे हो चुके हैं।
गुरुदेव ने कभी यह नहीं कहा कि मैं शरीर त्यागने वाला हूँ, लेकिन उनके हावभाव से यह स्पष्ट हो गया था।
वे भोजन लेना बंद कर चुके थे, अधिकतर समय ध्यान में रहते थे और कुछ बोलते नहीं थे। उनकी आँखों में एक अलौकिक चमक और चेहरे पर तेज था।
एक दिन, ध्यान की अवस्था में ही उन्होंने शरीर का त्याग किया। न कोई शोर, न कोई पीड़ा – बस शांति। आसपास का वातावरण भी जैसे स्तब्ध हो गया हो।
जब उनके शरीर त्यागने की खबर फैली, तो हजारों की संख्या में लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र से लोग पहुंचे।
गुरुदेव का शरीर सफेद वस्त्रों में लपेट कर पालकी में रखा गया।
अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया जैन परंपराओं के अनुसार सम्पन्न हुई।
वातावरण में एक विशेष शांति थी। कुछ लोगों ने दिव्य सुगंध महसूस की।
गुरुदेव की समाधि के पश्चात अनेक संतों ने उन्हें ‘चलता फिरता तीर्थ’ कहा।
कई लोगों ने कहा – ‘ये तो इस युग के महावीर थे।’
कुछ ने कहा – ‘इनका जन्म ही संसार को साधना और अहिंसा का मार्ग दिखाने के लिए हुआ था।’
उनके शिष्यों ने संकल्प लिया कि हम भी मौन, संयम और सेवा से उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।
भविष्य की पीढ़ियों को उनका जीवन एक प्रेरणा देता रहेगा।
गुरुदेव की स्मृति में आबू पर्वत के पास जहाँ उन्होंने साधना की थी, वहाँ एक समाधि स्थल बनाया गया।
यह कोई बड़ा मंदिर नहीं, बल्कि एक शांत स्थल है, जहाँ लोग मौन में बैठते हैं।
यह स्थान केवल जैनों का नहीं, हर धर्म के लोगों का तीर्थ बन गया।
गुरुदेव की कोई मूर्ति नहीं है – केवल मौन और साधना का प्रतीक। यह स्थान उन्हीं की तरह शांत, गहन और सरल है।
गुरुदेव ने कभी बड़ा बनने की इच्छा नहीं की – लेकिन उनके तप ने उन्हें महान बना दिया।
उन्होंने कभी प्रचार नहीं किया – लेकिन उनका मौन सबको खींच लाया।
उनका संदेश स्पष्ट था – साधना करो, सेवा करो, क्षमा को अपनाओ।